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चलता फिरता सिनेमा

जैसे ही डिब्बा खोला और उसमें से फ़िल्म की रील को कैमरे में लगाकर पर्दे पर चलाया तो कोई 420 वोल्टेज का झटका लगा। शायद रेलवे के कर्मचारियों ने गलत फ़िल्म का डिब्बा उनके स्टेशन पर उतार दिया था और उनकी फिल्म का डिब्बा किसी और जगह उतर गया था। ये बात है 60 के दशक की, जब आज की तरह सिनेमा डिजीटल नहीं था और नाहीं हर सिनेमाघर पक्की बिल्डिंग में चलता था। कुछ सिनेमा तंबू में पर्दा लगाकर बेंच पर दर्शकों को बिठाकर भी चलाए जाते थे। ऐसे ही एक सिनेमाघर में मेरे डैडी अपने बेरोजगारी के दिनों में कामचलाऊ मैनेजर थे। ये किस्सा भी उनका ही सुनाया हुआ है। तो बात ये थी कि उनका टेंट मार्का खानाबदोश सिनेमा पिछले 6 महीने से घाटे में चल रहा था। कारण बहुत सीधा था कि सिनेमा चलाने वाले नई फिल्मों के महंगे प्रिंट ला नहीं सकते थे और उनके यहाँ लगी हुई पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट को देखने बहुत भीड़ जुटती नहीं थी। जैसे तैसे डग्गामारी के साथ सिनेमा चलाया जा रहा था। लेकिन एक दिन वो हुआ जिसका किसी को अंदाजा ना था। रेलवे स्टेशन से एक फ़िल्म का डिब्बा लाया गया और जब फ़िल्म देखी तो फ़िल्म बदल चुकी थी। सिनेमा चलाने वाले एक दूसरे की तरफ देख...

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 4)

  (अब इंटरव्यू की कमान मेरे बाई ओर बैठे एक सर के पास आ चुकी थी, मतलब मेंबर 4 के पास)  मेंबर 4: आपने NET भी क्वालीफाई किया हुआ है. तो आपको क्या लगता है कि हायर स्टडीज में भारत की शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव किए जाने की जरूरत है?  मैं: सर, सबसे पहले तो हमको हायर एजुकेशन में एनरोलमेंट रेट को बढ़ाने पर ध्यान देना होगा और साथ ही टीचर स्टूडेंट रेशो को भी वैश्विक मानकों के हिसाब से अपनाना होगा. इसके अतिरिक्त इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम करने की जरूरत है ताकि शोध कार्य में छात्रों की रुचि जाग सके. हमें ध्यान देना होगा कि भारत में पी एच डी करने वालों की संख्या चीन जैसे देशों की तुलना में करीब 20 प्रतिशत ही है, जो कि चिंताजनक है. उच्च शिक्षा भी तभी बेहतर हो सकेगी जब स्कूली शिक्षा बेहतर होगी क्योंकि मैं दोनों को अलग न मानकर एक दूसरे से संबद्ध मानता हूं. एक सुझाव और है मेरा कि विषयों की चुनाव में भारत में बहुत कंजरवेटिव तरीका अपनाया जाता है कि यदि आपने कोई निश्चित विषय लिया है, तभी आप कुछ विषयों में पढ़ सकते हैं जबकि यह बात हमको छात्र की रुचि और अभिरुचि पर छोड़ देनी चाहिए, मतलब यदि को...

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 3)

  चेयरमैन सर ने जब गेंद मेंबर 1 की तरफ फेंक दी तो उन्होंने सबसे पहले मुझसे मेरे थिएटर करने के बारे में पूछा - तो अपने किस तरह के प्ले किए हैं? मैं - जी मैंने जन नाट्य मंच के साथ कई जगह स्ट्रीट प्ले किए हैं. मेंबर 1 - कहां कहां करने जाते थे आप स्ट्रीट प्ले?    मैं - स्कूलों में किए सर, इसके अलावा दिल्ली की कई स्लम्स में भी हमने स्ट्रीट प्ले किए थे सर.  मेंबर 1 - स्लम्स को लेकर के भारत सरकार की कुछ योजनाओं के बारे में बताइए? मैं - स्लम्स को लेकर के सरकार की कई योजनाएं हैं, जैसे कि राजीव आवास योजना, जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्युवल मिशन जिसमें अमृत योजना और स्वच्छ भारत योजना शामिल है. यह सभी और अन्य कई योजनाएं स्लम्स में स्वच्छता, इन्फ्रास्ट्रक्चरल सुधार, पानी, बिजली आपूर्ति बनाए रखने से संबंधित हैं. मेंबर 1 - अमृत योजना का पूरा नाम पता है आपको?  मैं - ( थोड़ा अटक अटककर) अटल मिशन फॉर रिजुविनेशन….. (और अब मुझे आगे का याद नहीं आ रहा था, थोड़ा जोर लगाया तो थोड़ा और याद आया) .... फॉर अर्बन… मेंबर 1 - (मेरी सहायता करते हुए बोले) ट्रांसफॉर्मेशन…बढ़िया. में...

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू: भाग 2

दरबार के अधिकारियों ने अपने हाथ वाले पन्ने पलटने शुरू किए और मैंने इधर अपनी धड़कने संभालनी शुरू की. पहला प्रश्न जाहिर तौर से चेयरमैन सर मतलब जोशी जी की तरफ से आया.  चेयरमैन: हां तो आलोक, आप पहले बैंक में थे, फिर आपने वो छोड़ दिया तो आजकल क्या कर रहे हैं? मैं: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) सर अभी मैं एक कोचिंग में बैंक और एस एस सी के एस्पिरेंट्स को गाइड करता हूं (ये बोलते हुए थोड़ी हिचकिचाहट थी, क्योंकि बाहर यही कहा गया था कि ये बिल्कुल भी मत कहना, मगर मुझे हमेशा से झूठ बोलने से ज्यादा सच बोलना ठीक लगा है तो यही कहा) चेयरमैन: हां, ठीक भी है, पढ़ाना अच्छा काम ही है . (जोशी जी की खास बात यह थी कि वे पूरे इंटरव्यू में मुझे कभी मुस्कुराते नहीं दिखे, एकदम कठोर चेहरा, बिना किसी भाव के, उनको देखकर समझ पाना मुश्किल था कि उन पर किसी भी जवाब का क्या प्रभाव पड़ रहा है?) फिर से चेयरमैन: अच्छा आलोक तो आपको थियेटर का शौक है, तो आप थियेटर सिर्फ देखते हैं या करते भी हैं?  मैं: सर! देखता भी हूं और कुछ समय तक किया भी है.  चेयरमैन: तो हाल ही मैं आपने कौन सा प्ले देखा है? मैं: जी हाल ही मै...

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 1)

  10 अप्रैल 2018 मेरे लिए एक खास दिन था क्योंकि उस दिन मैं यूपीएससी की मुख्य इमारत में प्रवेश पाने जा रहा था. दोपहर एक बजे करीब मेरी रिपोर्टिंग थी और मैं 11 बजे ही सूट - बूट पहनकर एकदम तैयार था. फिर सीधे कैब करके पहुंच गया यूपीएससी की बिल्डिंग के सामने. अंदर जाते हुए एक छोटी सी लाइन लगी थी, जिसमें मेरे जैसे ही कई कैंडिडेट्स सूट और साड़ी पहने सजे-धजे खड़े थे. अंदर पहुंचने पर सबसे पहले हम सभी को 6 - 6 कैंडिडेट्स के समूह में बांट दिया गया और फिर शुरू हुआ हम सभी का डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन. डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में करीब 1 घंटा लग गया और उसके बाद हमें वहां से आगे एक बड़े हॉल में बिठा दिया गया. यह वो हॉल था जहां हमें इंतजार करना था अपनी अपनी बारी का. एक अजीब सी खुशी, एक अजीब सा भय और एक अजीब सी चिंता तीनों आपस में मिलकर उस हॉल में एक अलग ही माहौल बना रहे थे. मेरा उस ग्रुप में चौथा नंबर था, ऐसा मुझे बता दिया गया था. स्पष्ट था कि मुझे करीब डेढ़ से दो घंटा वहां उसी अजीब से माहौल में गुजारना था.  अगले दो घंटे अपनी बारी के इंतजार में गुजरे लेकिन तब तक बाकी के लोगों से बातचीत होना शुरू हो च...

हरामखोर सरकारी आदमी

 2012 में मेरा चयन कई बैंकों में हुआ क्योंकि तब कॉमन इंटरव्यू नहीं हुआ करता था। लेकिन ऐसा भी तब संभव हुआ जब एसबीआई ग्रुप अकेले 12000 के करीब वैकेंसी और बाकी 19 बैंक करीब 20 से 25 हजार वैकेंसी निकालती थी। आज के दौर में शायद मैं बैंक में चयनित नहीं हो पाता क्योंकि वर्तमान में बैंकिंग सेक्टर में कुल मिलाकर 7 से 8 हजार ही वैकेंसी आती है। तो क्या बैंकिंग में अब लोगों की कम जरूरत है या कहानी कुछ और है? क्योंकि 2013 के आरबीआई ने 2020 तक के दशक को सेवानिवृत्ति का दशक घोषित किया था, साथ ही साथ वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के कारण हर दिन नई ब्रांच खोली गई हैं लेकिन इन दोनों तथ्यों के बाद भी 2016 से ही बैंकिंग नियुक्ति आधी से भी आधी कर दी गई है। अब ऐसे में जब आप सरकारी बैंक जाते हैं तो वहां पर हर कर्मचारी असल में दो से तीन लोगों का वर्कलोड उठा रहा है, जिसकी वजह से हम सभी को एसबीआई और सरकारी बैंकों पर चुटकुला बनाने का मौका मिल जाता है। धीमे धीमे लोग प्राइवेट बैंक की तरफ जायेंगे और सरकारी बैंकों को भी निजीकरण की तरफ प्रोत्साहित कर दिया जाएगा। ऐसे में नियुक्ति न करना, बैंकिंग निजीकरण को बढ़ावा देने...

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल   अक्सर लोगों को सुनता हूं, जो खासतौर से नए नए राष्ट्रवादी बने हैं कि फ्री का राशन, फ्री की शिक्षा, फ्री पेंशन, फ्री महिला परिवहन आदि इत्यादि देश को एक गलत आदत में डाल रही हैं और यह एक तरह की गलत राजनीति है जो कि नहीं होनी चाहिए।   मेरी इस पर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि फ्री का तो कुछ नहीं होता क्योंकि भारत का हर नागरिक किसी न किसी रूप में टैक्स दे ही रहा है। ज्यादा कमाने वाला प्रत्यक्ष इनकम टैक्स और अप्रत्यक्ष जीएसटी दोनों ही दे रहा है, वहीं बेहद गरीब व्यक्ति भी किसी अन्य भारतीय की तरह अप्रत्यक्ष कर, हर खरीदी हुई चीज पर बराबर रूप से दे रहा है। यदि ऐसे में इस टैक्स का कुछ हिस्सा एक वेलफेयर सोसायटी के रूप में गरीब और कम कमाने वाले लोगों को वापिस मिल भी रहा है तो वो फ्री का कैसे हो गया? अपना पैसा वापिस मिलना भी फ्री हो जाता है क्या? वर्तमान सरकार ने भी इंडेयरेक्टली यह मान लिया है कि देश के 80 करोड़ लोगों पर राशन तक खरीदने में दिक्कत है तो ऐसे देश के संविधान में निहित नीति निदेशक तत्वों के आदर्शों के आधार पर देश को कल्याणकारी राज्य बनाने ...