चलता फिरता सिनेमा

जैसे ही डिब्बा खोला और उसमें से फ़िल्म की रील को कैमरे में लगाकर पर्दे पर चलाया तो कोई 420 वोल्टेज का झटका लगा। शायद रेलवे के कर्मचारियों ने गलत फ़िल्म का डिब्बा उनके स्टेशन पर उतार दिया था और उनकी फिल्म का डिब्बा किसी और जगह उतर गया था।

ये बात है 60 के दशक की, जब आज की तरह सिनेमा डिजीटल नहीं था और नाहीं हर सिनेमाघर पक्की बिल्डिंग में चलता था। कुछ सिनेमा तंबू में पर्दा लगाकर बेंच पर दर्शकों को बिठाकर भी चलाए जाते थे। ऐसे ही एक सिनेमाघर में मेरे डैडी अपने बेरोजगारी के दिनों में कामचलाऊ मैनेजर थे।

ये किस्सा भी उनका ही सुनाया हुआ है। तो बात ये थी कि उनका टेंट मार्का खानाबदोश सिनेमा पिछले 6 महीने से घाटे में चल रहा था। कारण बहुत सीधा था कि सिनेमा चलाने वाले नई फिल्मों के महंगे प्रिंट ला नहीं सकते थे और उनके यहाँ लगी हुई पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट को देखने बहुत भीड़ जुटती नहीं थी। जैसे तैसे डग्गामारी के साथ सिनेमा चलाया जा रहा था।

लेकिन एक दिन वो हुआ जिसका किसी को अंदाजा ना था। रेलवे स्टेशन से एक फ़िल्म का डिब्बा लाया गया और जब फ़िल्म देखी तो फ़िल्म बदल चुकी थी। सिनेमा चलाने वाले एक दूसरे की तरफ देखने लगे क्योंकि दिक्कत यह थी कि उस जमाने में पोस्टर 15 दिन पहले ही एक दूसरे पार्सल से आ जाया करते थे और कस्बे के हर हिस्से में पोस्टर लग चुके थे लेकिन फ़िल्म तो वो आई ही नहीं थी, जिसके पोस्टर लगे थे। मगर साथ में ही हर किसी का दिल बल्लियों उछल रहा था क्योंकि गलती से जो फ़िल्म आ गयी थी, वो एक रंगीन नई रिलीज की फ़िल्म थी। 

हुआ ये था कि जो फ़िल्म आनी थी, उसका नाम था नीलकमल लेकिन ये नीलकमल राजकुमार वाली नहीं थी बल्कि एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म थी और जो फ़िल्म रेलवे की गलती से आ गई थी, वो राजकुमार जी की ही नई नई रिलीज नीलकमल थी। अब तो बस कैसे भी जनता को ये बताना था कि गुरु! हम इस बार नई फिल्म ले आए हैं। तुरंत एक रिक्शा पूरे कस्बे में दौड़ाया गया इस सूचना को लेकर के लेकिन कस्बे का कोई आदमी ये मनाना ही ना चाह रहा था कि इस फटेहाल सिनेमा में नई वाली नीलकमल आ भी सकती है। अंततः मैनेजर की हैसियत से डैडी ने तरीका निकाला कि शो चलाओ और फ़िल्म के डायलॉग लाउडस्पीकर की सहायता से जनता को सुनाओ।

इस तरकीब ने तो कमाल ही कर दिया। जैसे ही बाहर खड़े लोगों ने राजकुमार साहब की भारी आवाज सुनी, मानो कोई मेला टूट पड़ा। सिनेमा खचाखच भर गया। यहाँ तक कि इंटरवल में भी कोई बाहर आने को राजी न था क्योंकि उसकी बेंच छिन जाने का खतरा था। इस वजह से बाहर खड़े खोमचे वाले, सिनेमा वालों से बड़े खफा हुए कि न जाने कौन सी फ़िल्म ले आए हैं कि हमारे टिक्की, गोलगप्पे बिक ही नहीं रहे।

डैडी और सिनेमा वाले जानते थे कि रेलवे की यह गलती सुधरने में भी कम से कम एक हफ्ता लग ही जाएगा। क्योंकि जिस जगह पुरानी नीलकमल उतर गई है, वो वहाँ से आएगी, तब ये नई वाली उस दूसरे शहर के सिनेमा के लिए जाएगी। तो उन्होंने एक हफ्ते तक राजकुमार की नीलकमल को धसक के चलाया और 6 महीने का घाटा महज एक हफ्ते में कवर कर लिया।

सोचता हूँ आज के जमाने में ऐसी गलती हो ही न पाती, लेकिन आज के जमाने में फिर ऐसा किस्सा सुनने को भी कहाँ मिलता?



Comments

Popular posts from this blog

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 3)

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू: भाग 2