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Showing posts from May, 2024

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 1)

  10 अप्रैल 2018 मेरे लिए एक खास दिन था क्योंकि उस दिन मैं यूपीएससी की मुख्य इमारत में प्रवेश पाने जा रहा था. दोपहर एक बजे करीब मेरी रिपोर्टिंग थी और मैं 11 बजे ही सूट - बूट पहनकर एकदम तैयार था. फिर सीधे कैब करके पहुंच गया यूपीएससी की बिल्डिंग के सामने. अंदर जाते हुए एक छोटी सी लाइन लगी थी, जिसमें मेरे जैसे ही कई कैंडिडेट्स सूट और साड़ी पहने सजे-धजे खड़े थे. अंदर पहुंचने पर सबसे पहले हम सभी को 6 - 6 कैंडिडेट्स के समूह में बांट दिया गया और फिर शुरू हुआ हम सभी का डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन. डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में करीब 1 घंटा लग गया और उसके बाद हमें वहां से आगे एक बड़े हॉल में बिठा दिया गया. यह वो हॉल था जहां हमें इंतजार करना था अपनी अपनी बारी का. एक अजीब सी खुशी, एक अजीब सा भय और एक अजीब सी चिंता तीनों आपस में मिलकर उस हॉल में एक अलग ही माहौल बना रहे थे. मेरा उस ग्रुप में चौथा नंबर था, ऐसा मुझे बता दिया गया था. स्पष्ट था कि मुझे करीब डेढ़ से दो घंटा वहां उसी अजीब से माहौल में गुजारना था.  अगले दो घंटे अपनी बारी के इंतजार में गुजरे लेकिन तब तक बाकी के लोगों से बातचीत होना शुरू हो च...

हरामखोर सरकारी आदमी

 2012 में मेरा चयन कई बैंकों में हुआ क्योंकि तब कॉमन इंटरव्यू नहीं हुआ करता था। लेकिन ऐसा भी तब संभव हुआ जब एसबीआई ग्रुप अकेले 12000 के करीब वैकेंसी और बाकी 19 बैंक करीब 20 से 25 हजार वैकेंसी निकालती थी। आज के दौर में शायद मैं बैंक में चयनित नहीं हो पाता क्योंकि वर्तमान में बैंकिंग सेक्टर में कुल मिलाकर 7 से 8 हजार ही वैकेंसी आती है। तो क्या बैंकिंग में अब लोगों की कम जरूरत है या कहानी कुछ और है? क्योंकि 2013 के आरबीआई ने 2020 तक के दशक को सेवानिवृत्ति का दशक घोषित किया था, साथ ही साथ वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के कारण हर दिन नई ब्रांच खोली गई हैं लेकिन इन दोनों तथ्यों के बाद भी 2016 से ही बैंकिंग नियुक्ति आधी से भी आधी कर दी गई है। अब ऐसे में जब आप सरकारी बैंक जाते हैं तो वहां पर हर कर्मचारी असल में दो से तीन लोगों का वर्कलोड उठा रहा है, जिसकी वजह से हम सभी को एसबीआई और सरकारी बैंकों पर चुटकुला बनाने का मौका मिल जाता है। धीमे धीमे लोग प्राइवेट बैंक की तरफ जायेंगे और सरकारी बैंकों को भी निजीकरण की तरफ प्रोत्साहित कर दिया जाएगा। ऐसे में नियुक्ति न करना, बैंकिंग निजीकरण को बढ़ावा देने...

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल   अक्सर लोगों को सुनता हूं, जो खासतौर से नए नए राष्ट्रवादी बने हैं कि फ्री का राशन, फ्री की शिक्षा, फ्री पेंशन, फ्री महिला परिवहन आदि इत्यादि देश को एक गलत आदत में डाल रही हैं और यह एक तरह की गलत राजनीति है जो कि नहीं होनी चाहिए।   मेरी इस पर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि फ्री का तो कुछ नहीं होता क्योंकि भारत का हर नागरिक किसी न किसी रूप में टैक्स दे ही रहा है। ज्यादा कमाने वाला प्रत्यक्ष इनकम टैक्स और अप्रत्यक्ष जीएसटी दोनों ही दे रहा है, वहीं बेहद गरीब व्यक्ति भी किसी अन्य भारतीय की तरह अप्रत्यक्ष कर, हर खरीदी हुई चीज पर बराबर रूप से दे रहा है। यदि ऐसे में इस टैक्स का कुछ हिस्सा एक वेलफेयर सोसायटी के रूप में गरीब और कम कमाने वाले लोगों को वापिस मिल भी रहा है तो वो फ्री का कैसे हो गया? अपना पैसा वापिस मिलना भी फ्री हो जाता है क्या? वर्तमान सरकार ने भी इंडेयरेक्टली यह मान लिया है कि देश के 80 करोड़ लोगों पर राशन तक खरीदने में दिक्कत है तो ऐसे देश के संविधान में निहित नीति निदेशक तत्वों के आदर्शों के आधार पर देश को कल्याणकारी राज्य बनाने ...