एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 1)

 


10 अप्रैल 2018 मेरे लिए एक खास दिन था क्योंकि उस दिन मैं यूपीएससी की मुख्य इमारत में प्रवेश पाने जा रहा था. दोपहर एक बजे करीब मेरी रिपोर्टिंग थी और मैं 11 बजे ही सूट - बूट पहनकर एकदम तैयार था. फिर सीधे कैब करके पहुंच गया यूपीएससी की बिल्डिंग के सामने. अंदर जाते हुए एक छोटी सी लाइन लगी थी, जिसमें मेरे जैसे ही कई कैंडिडेट्स सूट और साड़ी पहने सजे-धजे खड़े थे.


अंदर पहुंचने पर सबसे पहले हम सभी को 6 - 6 कैंडिडेट्स के समूह में बांट दिया गया और फिर शुरू हुआ हम सभी का डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन. डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन में करीब 1 घंटा लग गया और उसके बाद हमें वहां से आगे एक बड़े हॉल में बिठा दिया गया. यह वो हॉल था जहां हमें इंतजार करना था अपनी अपनी बारी का. एक अजीब सी खुशी, एक अजीब सा भय और एक अजीब सी चिंता तीनों आपस में मिलकर उस हॉल में एक अलग ही माहौल बना रहे थे. मेरा उस ग्रुप में चौथा नंबर था, ऐसा मुझे बता दिया गया था. स्पष्ट था कि मुझे करीब डेढ़ से दो घंटा वहां उसी अजीब से माहौल में गुजारना था. 


अगले दो घंटे अपनी बारी के इंतजार में गुजरे लेकिन तब तक बाकी के लोगों से बातचीत होना शुरू हो चुकी थी और हम हल्के फुल्के मजाक कर रहे थे, शायद इसलिए भी कि अंदरूनी घबराहट कम से कम ऊपर नजर नहीं ही आए. कुछ समय बाद जब तीसरे कैंडिडेट को बुला लिया गया तो मेरा दिल सीने से टकराने लगा क्योंकि अब अगला नंबर मेरा ही था. उसके जाने के महज 20 25 मिनट बाद ही मुझे भी बुला लिया गया और पी सी जोशी सर के पैनल के बाहर रखी एक कुर्सी पर बिठा दिया गया. यह एकदम अजीब सा समय था क्योंकि अंदर तीसरे कैंडिडेट का इंटरव्यू चल रहा था और मैं बाहर अपने अंदर बुलाए जाने का इंतजार कर रहा था. आज सोचता हूं कि उस समय बीपी नापने की मशीन होती तो न जाने कितना हाई बीपी आता मेरा. 


करीब आधे घंटे से ज्यादा बैठने के बाद अंदर वाला कैंडिडेट बाहर आ गया और मैं अंदर जाने के लिए खड़ा हो गया. उसकी और मेरी नजरें मिली, हम मुस्कुराए और दो मिनट बाद अर्दली ने मुझसे कहा कि आपको अंदर बुला रहे हैं, अंदर चले जाइए. मैने अपने हाथों से उस भरी से दरवाजे को खिसकाया और सामने देखते हुए पूछा कि क्या मैं अंदर आ सकता हूं. चेयरमैन की आवाज आई, आइए आइए बैठिए. मैने सभी की तरफ देखते हुए एक बार में ही गुड इवनिंग बोला और मैं आराम से कुर्सी पर बैठ गया.


इससे पहले कि इंटरव्यू की तरफ बढूं, पहले मैं उस कमरे के बारे में बताना चाहूंगा, जो बहुत बड़ा और भव्य था. उस कमरे की सेटिंग आम इंटरव्यू कक्ष जैसी नहीं ही थी. उस कमरे का लुक किसी एंटीक रूम जैसा था, जहां कलात्मक चीजें रखी हों, उस समय चारों तरफ ढंग से देख तो नहीं पाया था, मगर कमरे के वाइब्रेशन कुछ ऐसे थे जैसे मानो मैं किसी राजसी कमरे में प्रवेश कर चुका हूं. छत काफी ऊंची थी, कमरे में प्रकाश बहुत तेज नहीं था लेकिन कम भी नहीं था. उस बड़े से कमरे के गेट से अपनी कुर्सी तक जाने में मुझ करीब 12 से 15 कदम चलना पड़ा. पैनल के साथ कैंडिडेट के बैठने की व्यवस्था भी काफी अलग थी, वहां एक बड़ी आयताकार मेज थी, जिसके एक तरफ मैं और ठीक दूसरी तरफ चेयरमैन साहब अकेले बैठे थे. आयताकार मेज की लंबाई वाले हिस्से में मेरे सीधे हाथ की तरफ एक सर और एक मैडम बैठी थी तो दूसरी लंबाई वाले हिस्से में मेरे बाएं हाथ की तरफ दो सर बैठे हुए थे. सभी की कुर्सियां, यहां तक कि वह भी जिस पर मैं बैठा था, एकदम सिंहासन जैसी थी. मेज पर खाने पीने की चीजें सजी हुई थी और मैं ऐसा महसूस कर रहा था मानो किसी दरबार में आकर के बैठ गया हूं. दरबारी कार्यवाही बस अब शुरू ही होने वाली थी. 


क्रमशः



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