सब्सिडी, छूट और फ्री का माल
सब्सिडी, छूट और फ्री का माल
अक्सर लोगों को सुनता हूं, जो खासतौर से नए नए राष्ट्रवादी बने हैं कि फ्री का राशन, फ्री की शिक्षा, फ्री पेंशन, फ्री महिला परिवहन आदि इत्यादि देश को एक गलत आदत में डाल रही हैं और यह एक तरह की गलत राजनीति है जो कि नहीं होनी चाहिए।
मेरी इस पर पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि फ्री का तो कुछ नहीं होता क्योंकि भारत का हर नागरिक किसी न किसी रूप में टैक्स दे ही रहा है। ज्यादा कमाने वाला प्रत्यक्ष इनकम टैक्स और अप्रत्यक्ष जीएसटी दोनों ही दे रहा है, वहीं बेहद गरीब व्यक्ति भी किसी अन्य भारतीय की तरह अप्रत्यक्ष कर, हर खरीदी हुई चीज पर बराबर रूप से दे रहा है। यदि ऐसे में इस टैक्स का कुछ हिस्सा एक वेलफेयर सोसायटी के रूप में गरीब और कम कमाने वाले लोगों को वापिस मिल भी रहा है तो वो फ्री का कैसे हो गया? अपना पैसा वापिस मिलना भी फ्री हो जाता है क्या?
वर्तमान सरकार ने भी इंडेयरेक्टली यह मान लिया है कि देश के 80 करोड़ लोगों पर राशन तक खरीदने में दिक्कत है तो ऐसे देश के संविधान में निहित नीति निदेशक तत्वों के आदर्शों के आधार पर देश को कल्याणकारी राज्य बनाने में इस तरह की सब्सिडी या तथाकथित फ्री का माल देने में क्या दिक्कत है?
तर्क में लोग कहते हैं कि इस तरह से देश का विकास नहीं हो पाएगा। किंतु दुनिया का विकसित से विकसित देश भी सबसे पहले नागरिक कल्याण की बात सोचता है। उदाहरण के लिए यूके, कनाडा में 65 वर्ष से ऊपर के हर व्यक्ति को पेंशन मिलती है, हर व्यक्ति को। इसी तरह नॉर्वे, यूके, ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के पालन हेतु हर परिवार को एकमुश्त राशि प्रतिमाह दी जाती है। इटली जैसे देशों में तो सोशल सिक्योरिटी इतनी मजबूत है कि वहां माना जाता है कि युवा कमाते हैं और वृद्ध उसे खर्च करते हैं। कई विकसित देशों में नौकरी चले जाने पर सरकारें आपके अगले एक साल तक आपको आपकी पूर्व सैलरी का लगभग 60 प्रतिशत तक देती है। क्या इस तरह की हर सुविधा वहां के लोगों को कामचोर बना रही है?
फिर बात आती है कि भारत पर इतना पैसा नहीं कि वो विकसित देशों की तरह सब्सिडी का इतना बोझ उठाए। हां, इस बात से सहमत हुआ जा सकता है लेकिन सच यह है कि भारत में जिस तरह डबल टैक्स की मार दी जा रही है, उसके एवज में इस तरह की छूट कोई बड़ी मात्रा में नहीं है। और जहां तक संभव है, वहां तक लोगों का टैक्स उन्हें वापिस सुविधाओं के रूप में मिले, उतना तो किया ही जाना चाहिए। फिर जब अमीरों के हजारों करोड़ों के ऋण माफ किए जा रहे हैं, तो ऐसे में सिर्फ आम व्यक्ति को मिलने वाली सब्सिडी से ही क्यों इतनी चिढ़ है?
एक बात और आती है कि देश में आज जो रोड और विकास की लहर है, यदि इस तरह की छूट दी जायेंगी तो वो बंद हो जायेगा। तो मेरा बस इतना सा तर्क है कि देश नागरिकों के विकास से विकसित होता है, महज वहां के ढांचों से विकसित नहीं होता तो ऐसे में सब्सिडी और अवसंरचना के बीच सामंजस्य बनाने से ही देश का विकास होगा।
एक अंतिम तर्क यह कि फ्री का माल तो साहब लोगों को कामचोर बना रहा है, वे शराब पीते हैं इसकी। तो मेरा कहना है कि बनाता होगा, बिल्कुल बनाता होगा लेकिन कितनों को? आपके पास कोई डाटा है कि कितने लोग शराबी बन गए? आपने दो चार को देखा और संपूर्ण बात का सामान्यीकरण कर दिया। लेकिन इस तरह तो मैंने ऐसे तमाम लोगों को देखा है जो इन्हीं पेंशन, सब्सिडी, छात्रवृत्ति इत्यादि के दम पर अच्छी पढ़ाई लिखाई कर पाए हैं और आज एक सम्मानित नौकरी कर रहे हैं। यदि ये जनकल्याण योजनाएं न होती तो उनका भविष्य क्या होता? तो क्या उन्हें उदाहरण में न गिना जाए?
इस पूरे लेख में आप यह न समझें कि मैं सब्सिडी को अनाप- शनाप बांटने की बात कर रहा हूं लेकिन हां जब तक प्राथमिकता की बात है तो देश का गरीब और देश के आम नागरिक का जनकल्याण ही किसी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। आम जनता का पेट काटकर किया गया विकास भी अंततः खोखला साबित होगा क्योंकि तब इन्हीं आम लोगों में से तमाम लोग अपराध का रास्ता पकड़ लेंगे क्योंकि पेट की भूख व्यक्ति से ज्यादा बुरा काम करा सकती है।
आलोक वार्ष्णेय
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