एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 3)

 चेयरमैन सर ने जब गेंद मेंबर 1 की तरफ फेंक दी तो उन्होंने सबसे पहले मुझसे मेरे थिएटर करने के बारे में पूछा - तो अपने किस तरह के प्ले किए हैं?


मैं - जी मैंने जन नाट्य मंच के साथ कई जगह स्ट्रीट प्ले किए हैं.


मेंबर 1 - कहां कहां करने जाते थे आप स्ट्रीट प्ले?

  

मैं - स्कूलों में किए सर, इसके अलावा दिल्ली की कई स्लम्स में भी हमने स्ट्रीट प्ले किए थे सर. 


मेंबर 1 - स्लम्स को लेकर के भारत सरकार की कुछ योजनाओं के बारे में बताइए?


मैं - स्लम्स को लेकर के सरकार की कई योजनाएं हैं, जैसे कि राजीव आवास योजना, जवाहर लाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्युवल मिशन जिसमें अमृत योजना और स्वच्छ भारत योजना शामिल है. यह सभी और अन्य कई योजनाएं स्लम्स में स्वच्छता, इन्फ्रास्ट्रक्चरल सुधार, पानी, बिजली आपूर्ति बनाए रखने से संबंधित हैं.


मेंबर 1 - अमृत योजना का पूरा नाम पता है आपको? 


मैं - (थोड़ा अटक अटककर) अटल मिशन फॉर रिजुविनेशन…..(और अब मुझे आगे का याद नहीं आ रहा था, थोड़ा जोर लगाया तो थोड़ा और याद आया).... फॉर अर्बन…


मेंबर 1 - (मेरी सहायता करते हुए बोले) ट्रांसफॉर्मेशन…बढ़िया.


मेंबर 1 - अच्छा! एक बात बताइए, आपको नहीं लगता कि भारतीय पुलिस को रिफॉर्म की जरूरत है. कई देशों में पुलिस बिना खतरनाक हथियारों के भी अपराधियों को संभाल लेती है, तो क्या हमको भी अपनी पुलिस में इस तरह का सुधार करना चाहिए. 


मैं - (समझ गया था की यह प्रश्न एक तरह से उस समय पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर्स के संदर्भ में आया था) सर, रिफॉर्म की जरूरत है, इस बात में कोई भी शक नहीं है लेकिन भारतीय पुलिस की स्थितियों की तुलना कुछ विकसित देशों की हथियार रहित पुलिस से करना मुझे उचित नहीं लगता. भारत में अपराधिक स्थितियां बहुत से अन्य देशों से बेहद भिन्न हैं और ऐसे में कई बार पुलिस के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह हथियारों का प्रयोग करके उन अपराधियों का सामना करे तो मेरा मानना है कि हथियारों का प्रयोग करना पुलिस के लिए भारतीय संदर्भ में कई जगह बेहद जरूरी है. रही बात रिफॉर्म की तो अभी भी पुलिस में सामान्य जनता से बातचीत करने, उनकी बात सुनने समझने की ट्रेनिंग की कमी जरूर दिखाई देती है, वो डराने धमकाने वाले अंदाज में ज्यादा बात करते नजर आते हैं. ट्रैफिक पुलिस जिसका सामना अधिकांशतः अपराधियों से नहीं ही होता, वे भी आम जनता से बुरी तरह पेश आते हैं. ऐसे में सामान्य जनता से सहज तरीके से बातचीत करने की ट्रेनिंग जैसे सुधारों की बहुत आवश्यकता है ताकि पुलिस के प्रति आम लोगों का विश्वास कायम हो. मतलब पुलिस को ज्यादा एंपेथेटिक बनाने की वाकई आवश्यकता है.


(मेरे इस जवाब से मेंबर 2 काफी खुश से नजर आए, बाकी चेयरमैन जोशी जी अपने सपाट अंदाज में ही बैठे बैठे कुछ लिखते नजर आ रहे थे)

 

(गेंद अब मेंबर 3 के पाले में आ चुकी थी)


मेंबर 3: (ये पैनल में अकेली महिला मेंबर थी जिनकी कुर्सी मेरी कुर्सी के सबसे ज्यादा करीब थी, उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए पहला सवाल किया) 

आलोक, आप हिंदी साहित्य के विद्यार्थी हो तो आपको सबसे ज्यादा पसंद कौन हैं? 


मैं - मैम, मुझे कवियों में कबीर और लेखकों में प्रेमचंद बेहद पसंद है.


मेंबर 3: आपने हरिवंश राय बच्चन का नाम सुना है?


मैं - जी मैम सुना है. उन्होंने मधुशाला जैसी प्रसिद्ध रचना लिखी है. 


मेंबर 3 : तो उनकी लिखी कोई पंक्ति सुनाइए? 


मैं : मंदिर मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला…


मेंबर 3: तुलसीदास को भी आपने पढ़ा ही होगा, उनका लिखा भी कुछ सुना दीजिए?


मैं - (और न जाने मुझे क्या हुआ, तुलसीदास का लिखा कुछ भी मुझे याद आने से ही इंकार करने लगा, करीब 15 20 सेकंड के पॉज के बाद मैंने कहा- सॉरी मैम, मैं अभी कुछ भी याद नहीं कर पा रहा हूं. 


मेंबर 3 : अच्छा गांधीजी का जंतर पढ़ा है आपने? 


मैं: (फिर एक बार दिमाग एक सेकंड को ब्लैक हुआ, लेकिन अचानक कुछ कौंधा) उनका जंतर एनसीईआरटी की हर किताब के पीछे लिखा होता है, इतना तो याद आ रहा है मुझे. ( एक दो मेंबर हल्का मुस्कुराने लगे, मैं भी हल्की मुस्कुराहट लिए था) शायद तभी मेंटोज बिना खाए मेरे दिमाग की बत्ती जल उठी और मैंने कहा- जी उन्होंने कहा है कि जब भी कोई काम करो तो हमेशा यह देखो कि अंतिम व्यक्ति पर उसका क्या असर पड़ रहा है? यदि आपके कार्य से अंतिम व्यक्ति या सबसे गरीब व्यक्ति पर भी कोई गलत असर नहीं पड़ रहा, तो आपका किया जाने वाला कार्य एकदम सही है. 


(मैं अभी तक सबकोंसियासली यही सोच रहा था कि तुलसीदास को कैसे भूल गया और अचानक से मुझे कुछ याद आया लेकिन कमाल ये कि वो यूपीएससी के सिलेबस वाले तुलसीदास से न याद आ आकर के मुझे अपनी दसवीं कक्षा में रसों के उदाहरण में याद किए तुलसीदास याद आए


मैम! यदि आप इजाजत दें तो मुझे तुलसीदास जी का लिखा याद आ गया है, सुना सकता हूं? 


मेंबर 3- जी बिलकुल सुनाइए.


मैं: तुलसी का यह दोहा हास्य रस का एक सुंदर उदाहरण है 


    “विंध्य के वासी उदासी, तपोव्रतधारी महाबिनु नारी दुखारे

    भए भए शिला सब चंद्रमुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे”


मेंबर 3- इसका अर्थ भी समझा दीजिए अब.


मैं - जी इसमें विंध्य के ऐसे लोगों के बारे में बताया है जिनका विवाह नहीं हुआ है और वो सभी राम के उनके यहां आने से बेहद खुश है क्योंकि उन्होंने सुना है कि राम के पैरों के स्पर्श मात्र से पत्थर भी अहिल्या बन गई थी, तो उनके विंध्य क्षेत्र में तो किसी भी तरह से पत्थरों की कोई कमी नहीं थी. 


(मैम के चेहरे पर एक मुस्कान थी और मेरा आत्मविश्वास अब काफी बढ़ चुका था) 


मेंबर 3 - आपने लिखा है कि आपको फिल्मों के सामाजिक प्रभावों की समीक्षा करना पसंद है, हाल में कौन सी फिल्म देखी है आपने? 


मैं - हाल ही में पैडमैन देखी थी मैंने.


मेंबर 3 - उस फिल्म की समीक्षा कीजिए कुछ पंक्तियों में? 


मैं - फिल्म अपने तकनीकी पक्षों में बेहतर थी, उसका कथानक कसा हुआ था और अभिनय के स्तर पर भी बेहतर थी किंतु संगीत उतना बेहतर नहीं कि लंबे समय तक याद रखा जा सके. लेकिन इस सबसे आगे फिल्म का जो सामाजिक महत्व है, वो बहुत ज्यादा है क्योंकि यह महिलाओं की मेंस्ट्रुअल हेल्थ पर बात करती है और उस विषय पर ऐसी फिल्मों की बहुत जरूरत है. 


(अब इंटरव्यू की कमान मेरे बाई ओर बैठे एक सर के पास आ चुकी थी, मतलब मेंबर 4 के पास) 


क्रमशः 


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