एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू: भाग 2

दरबार के अधिकारियों ने अपने हाथ वाले पन्ने पलटने शुरू किए और मैंने इधर अपनी धड़कने संभालनी शुरू की. पहला प्रश्न जाहिर तौर से चेयरमैन सर मतलब जोशी जी की तरफ से आया. 


चेयरमैन: हां तो आलोक, आप पहले बैंक में थे, फिर आपने वो छोड़ दिया तो आजकल क्या कर रहे हैं?


मैं: (हल्की मुस्कुराहट के साथ) सर अभी मैं एक कोचिंग में बैंक और एस एस सी के एस्पिरेंट्स को गाइड करता हूं (ये बोलते हुए थोड़ी हिचकिचाहट थी, क्योंकि बाहर यही कहा गया था कि ये बिल्कुल भी मत कहना, मगर मुझे हमेशा से झूठ बोलने से ज्यादा सच बोलना ठीक लगा है तो यही कहा)


चेयरमैन: हां, ठीक भी है, पढ़ाना अच्छा काम ही है. (जोशी जी की खास बात यह थी कि वे पूरे इंटरव्यू में मुझे कभी मुस्कुराते नहीं दिखे, एकदम कठोर चेहरा, बिना किसी भाव के, उनको देखकर समझ पाना मुश्किल था कि उन पर किसी भी जवाब का क्या प्रभाव पड़ रहा है?)


फिर से चेयरमैन: अच्छा आलोक तो आपको थियेटर का शौक है, तो आप थियेटर सिर्फ देखते हैं या करते भी हैं? 


मैं: सर! देखता भी हूं और कुछ समय तक किया भी है. 


चेयरमैन: तो हाल ही मैं आपने कौन सा प्ले देखा है?


मैं: जी हाल ही मैं मैंने ताजमहल का टेंडर नाम का एक कॉमिक सटायर प्ले देखा है. 


चेयरमैन: किस चीज पर सटायर था वो प्ले? 


मैं: सर यह ब्यूरोक्रेसी की लाल फीताशाही पर सटायर था. 


चेयरमैन: अच्छा आलोक, हम सब्ज़ी खरीदते हैं, फल भी खरीदते हैं और इन सभी का मूल्य भी बढ़ ही रहा है. खाद्य मुद्रास्फीति लगातार बढ़ रही है. 

(मैं मन ही मन सोचने लगा कि इंटरव्यू तो इकोनॉमिक्स की राह पर चल पड़ा है और यह सोचकर मुझे थोड़ी घबराहट हुई क्योंकि इकोनॉमिक्स में मामला कई दफा फंस जाने का खतरा रहता है. मैं यह सब सोच रहा था और उधर चेयरमैन सर अपना प्रश्न पूरा कर रहे थे) तो इस बढ़ती खाद्य मुद्रास्फीति के बावजूद हमारे किसानों को कोई खास फायदा नहीं होता दिख रहा है, आए दिन हम किसान आत्महत्या की खबरें भी सुनते हैं. तो आप इस बारे में क्या सोचते है कि हम ऐसा क्या करे कि किसानों को वाजिफ कीमत मिल सके? 


मैं: (गहरी सांस ली क्योंकि जिस प्रश्न की लंबाई से मैं डर रहा था, वो तो बहुत आसान निकला) सर! भारत में किसान को कीमत न मिलने का कारण मंडियों में बिचौलियों द्वारा फायदा उठा लेना है और इस बात की बाध्यता भी है कि किसान अपने जिले की मंडी में ही फसल बेच सकता है,  जिसके लिए हाल ही में NATIONAL AGRICULTURE MARKET अर्थात् NAM रूपी व्यवस्था लाई गई है, साथ ही APMC ACT में सुधार किया जाना भी जरूरी है ताकि किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य प्राप्त हो सके. 


चेयरमैन: हम्मम! अच्छा इधर हमारे पाकिस्तान से रिश्तों में लगातार तनाव बना रहता है. (ओह, अब इंटरनेशनल रिलेशन पर चल गए ये) पाकिस्तान में भी आंतरिक उथल पुथल मची हुई है, तो क्या ये बेहतर नहीं होगा कि भारत, पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर के सिंध और बलूच वाले हिस्से को आजाद कराने में भूमिका निभाए. क्या यह भारत के फायदे में नहीं होगा?


मैं: (इसका जवाब देना थोड़ा ट्रिकी था, मगर मैंने फिर भी संभलकर जवाब देना शुरू किया) सर, मुझे लगता है कि ऐसा करना भारत के लिए फायदे से ज्यादा नुकसान का कारण बन सकता है. आज हमको सिर्फ एक अस्थिर पाकिस्तान से जूझना पड़ रहा है लेकिन यदि यही पाकिस्तान सिंध और बलूचिस्तान में टूटा या इसमें और ज्यादा राजनीतिक अस्थिरता आई तो भारत को शायद कई स्तरों पर जूझना पड़ सकता है. जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई जी ने एक बार UNO में बोला था कि हम अपने मित्र बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं, इसलिए उसी आधार पर मुझे लगता है कि पड़ोस में शांति का बना रहना, स्वयं हमारे लिए उचित रहेगा. 


चेयरमैन: (काउंटर प्रश्न करते हुए) अच्छा, लेकिन बांग्लादेश भी तो हमने ही बनवाया था, तब ये करना भी कैसे गलत हो जायेगा? 


मैं: जी सर, बांग्लादेश बनवाने में हमारी भूमिका जरूर थी लेकिन वो पूरा आंदोलन आंतरिक रूप से प्रेरित था, जिसमें मुजीबुर रहमान की भूमिका और भाषा का मुद्दा प्रमुख था. भारत ने उसमें अपनी भूमिका तभी स्पष्ट की जब स्वयं उस क्षेत्र की अस्थिरता भारत के लिए संकट बनने लगी. तो ऐसे में अभी सिंध और बलूचिस्तान में अस्थिरता को सीधे तौर पर हमारे द्वारा बढ़ाया जाना, विदेश नीति के स्तर पर बहुत सही निर्णय नहीं होगा. 


चेयरमैन: (उसी सपाट अंदाज में अब मेंबर 1 से मुखातिब होते हुए) सर अब आप पूछिए.

 

चेयरमैन साहब मेरे जवाबों से संतुष्ट थे या नहीं ये मुझे बिलकुल भी नहीं मालूम पड़ रहा था, बस इतना था कि अब तक मैं एकदम कंफर्ट जोन में आ चुका था, लग रहा था जैसे ड्राइंग रूम में बड़ी सी कुर्सी पर बैठकर कुछ ज्ञानी लोगों से चर्चा कर रहा हूं. चेहरे पर मुस्कान लगातार बनी हुई थी. लेकिन अभी 4 सदस्यों के प्रश्न बाकी थे. 


क्रमशः


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