हरामखोर सरकारी आदमी

 2012 में मेरा चयन कई बैंकों में हुआ क्योंकि तब कॉमन इंटरव्यू नहीं हुआ करता था। लेकिन ऐसा भी तब संभव हुआ जब एसबीआई ग्रुप अकेले 12000 के करीब वैकेंसी और बाकी 19 बैंक करीब 20 से 25 हजार वैकेंसी निकालती थी। आज के दौर में शायद मैं बैंक में चयनित नहीं हो पाता क्योंकि वर्तमान में बैंकिंग सेक्टर में कुल मिलाकर 7 से 8 हजार ही वैकेंसी आती है।


तो क्या बैंकिंग में अब लोगों की कम जरूरत है या कहानी कुछ और है? क्योंकि 2013 के आरबीआई ने 2020 तक के दशक को सेवानिवृत्ति का दशक घोषित किया था, साथ ही साथ वित्तीय समावेशन के लक्ष्य के कारण हर दिन नई ब्रांच खोली गई हैं लेकिन इन दोनों तथ्यों के बाद भी 2016 से ही बैंकिंग नियुक्ति आधी से भी आधी कर दी गई है।


अब ऐसे में जब आप सरकारी बैंक जाते हैं तो वहां पर हर कर्मचारी असल में दो से तीन लोगों का वर्कलोड उठा रहा है, जिसकी वजह से हम सभी को एसबीआई और सरकारी बैंकों पर चुटकुला बनाने का मौका मिल जाता है। धीमे धीमे लोग प्राइवेट बैंक की तरफ जायेंगे और सरकारी बैंकों को भी निजीकरण की तरफ प्रोत्साहित कर दिया जाएगा। ऐसे में नियुक्ति न करना, बैंकिंग निजीकरण को बढ़ावा देने का एक प्रयास ही प्रतीत होता है।


नियुक्तियों के मामले में बैंक ही नहीं, बल्कि एसएससी, रेलवे और अन्य सरकारी विभाग जैसे कि शिक्षा को भी आप उठा कर देख लीजिए। स्पष्ट हो जाएगा कि किस तरह नियुक्ति घटाई गई हैं और उनकी जगह थर्ड पार्टी और संविदा पर कार्य को बढ़ावा दिया गया है, जो अंततः शोषण को ही बढ़ावा देती है। सेना तक के संविदा सिस्टम आ गया है, तो बाकी की क्या ही बात करें? 


सरकारी विभागों के कर्मचारियों को कोसना तो इस कदर फैशन बन चुका है, मानो बाकी लोग सारा देश अपने कंधो पर लिए घूम रहे हैं, जबकि सच यही है कि सरकारी तंत्र को सही से सुनियोजित किया जाए तो वह गरीब तबके और प्राइमरी सेक्टर के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा।


खैर जाने दीजिए, मुझे मालूम है कि आपमें से ज्यादातर के लिए सरकार शानदार है, मगर सरकारी आदमी हरामखोर है। बाकी एक बात बता दूं कि हरामखोर हर जगह ही हरामखोर है, निजी क्षेत्र में भी मैंने बहुत ज्यादा चाटुकारिता और हरामखोरी देखी ही है।


#बाबा_बड़बोले

Comments

Popular posts from this blog

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू (भाग 3)

सब्सिडी, छूट और फ्री का माल

एक असफल कैंडिडेट का सफल UPSC इंटरव्यू: भाग 2